सोमवार, 9 दिसंबर 2013

ख्वाहिशों का राशिफल

वक़्त के साथ-साथ इंसान का जीवन के प्रति नजरिया भी बदलता रहता है। इंसान की उम्र और उसका अनुभव उसकी सोच पर निश्चित रूप से असर दिखाता है। उदाहरण के लिए जब हम टीनएज  या यंगस्टर होते हैं तो अपने डेली होरोस्कोप में लव और रोमांस वाले सेक्शन को सबसे पहले पढ़ते हैं और उसे ही जानने को सबसे ज्यादा उत्सुक रहते हैं। उसके बाद थोड़ा  परिपक्व होने पर वैवाहिक जीवन और कॅरिअर सम्बन्धी सेक्शन पर ध्यान देने लगते हैं। थोड़ी और उम्र बढ़ने पर हम बच्चे ,घर, सामाजिक  और सांसारिक कार्यकलापों से जुड़े सेक्शन को टटोलने लगते हैं। देखतें हैं कि समाज के दृष्टिकोण से सफल  कहलाने के लिए जो भी चीज़ें जरूरी है वो हमें मिलेंगी या नहीं? जैसे जीवन की उपलब्धियां, घर में सुख-शांति ,यश-सम्मान, सांसारिक वस्तुएं आदि। हमारी उम्र के साथ-साथ हमारी खुशियों और सफलता के पैमाने भी बदले रहते हैं। जीवन निश्चित रूप से परिवर्तनशील है और हमारी विचारधारा भी। या तो यूँ कहिये कि इस प्रगतिशील जीवन में हम जो पा लेते हैं उसके बारे में सोचना छोड़ देते हैं। और जो हमें पाना है उसके बारे में सोचते रहते है। उम्र के अंतिम पड़ाव तक हम कुछ न कुछ पाने को बैचैन रहते है और अपने डेली होरोस्कोप के जरिये जीवन में खोने-पाने का लेखा जोखा तैयार करते रहते हैं। पर हम ये भूल जाते हैं कि इस दुनिया में सबको सबकुछ नहीं मिलता।
दूर से देखने पर जो चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं पास जाने पर पता चलता है कि उनकी वास्तविकता ही कुछ और है। इस दुनिया में किसी के पास पैसा है और परिवार नहीं, परिवार है तो प्यार नहीं ,और प्यार है तो स्वास्थ्य नहीं । ऊपर वाले ने हम में से हर एक की  जिंदगी में कुछ न कुछ कमी दी है। सर्वगुणसम्पन्न यहाँ कोई भी नहीं। तो जरूरत यह है कि जो हमारे पास है उसकी कीमत समझी जाये और जो नहीं है उसको पाने का प्रयास करते रहें। जो आपके भाग्य में है वो आपको खुदबखुद  मिल ही जायेगा और जो खुशियां आपके हिस्से में नहीं आने वाली हैं वो लाख कोशिशों के बावजूद भी नहीं मिलेंगी। तो फिर फ़िक्र किस बात की।
रोबिन शर्मा की  किताब 'द मोंक हू सोल्ड हिज़ फरारी' जीवन की  इसी बात की  तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती है कि सब कुछ पाकर भी कुछ पाने कि तलाश ताउम्र ज़ारी रहती है। और अक्सर ऐसा होता है कि  कुछ पाने कि दौड़ में कुछ ऐसा पीछे छूट जाता है जिसकी भरपाई करना मुश्किल होता है।
इस किताब में एक ऐसे आदमी का ज़िक्र है जिसके पास पैसा, पावर, सफलता सबकुछ होता है लेकिन फिर अचानक एक दिन हार्टअटैक आने पर वह खुद को मौत के बहुत करीब पाता है। और उसे अहसास होता है कि सफलता और उपलब्धियों को पाने कि दौड़  में उसने जीवन का बहुत बड़ा भाग यूँ ही व्यर्थ कर दिया।
उसने पैसा तो कमाया लेकिन उस पैसे से उसे ख़ुशी नहीं मिली उल्टा उसने अपनी सेहत गँवा दी और वक़्त से पहले ही खुद को मौत के सामने खड़ा पाया। और फिर एक दिन वो अपना सब कुछ छोड़ कर हिमालय की श्रंखलाओं में फिर से एक नए जीवन कि खोज में निकल पड़ता है।
 तो कहानी का सार यही है कि जीवन की  उपलब्धि उसे सही प्रकार से जीने में है लेकिन जीवन जीने की  कला को जान लेना हर किसी के बस कि बात नही  है। वो तो विरले ही होते हैं जो इस सत्य को समझें हैं कि जीवन का उद्देश्य आखिर है क्या? सारी  जद्दोजहद के बाद अगर आप अंदर से खुश हैं तो सब ठीक है वर्ना सब कुछ बेकार है क्योंकि खुश रहने के लिए सबकुछ होना जरूरी नहीं होता यह तो  हमारे सोचने पर निर्भर करता है | कभी हमारे पास कुछ नहीं होता फिर भी हम बेहद खुश होते हैं और कभी सब कुछ मिल जाने पर भी कहीं कुछ कमीं लगती है। लेकिन शायद इसी का नाम  जिंदगी है।

1 टिप्पणी:

  1. सच कहा है ... मन से मिलती है शान्ति ... सब कुछ सोच पे निर्भर करता है ...

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